ईद-उल-अज़हा की नमाज़ अदा करने का तरीका

 

ईद-उल-अज़हा की नमाज़ अदा करने का तरीका बताया गया

 

-दर्स का समापन

 

जाकिर अली

 

आदर्द्ध  श्रीवास्तव

 

रिपोर्टर इंद्रजीत भारती प्यारी दुनिया

गोरखपुर। शाही जामा मस्जिद तकिया कवलदह मस्जिद में कुर्बानी पर चल रहे दर्स (व्याख्यान) के अंतिम दिन मंगलवार को हाफ़िज़ आफताब ने कहा कि ईद-उल-अज़हा पर्व सादगी, शांति व उल्लास के साथ मनाया जाए। साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाए। क़ुर्बानीगाह के चारों तरफ पर्दा लगाकर क़ुर्बानी करें। अपशिष्ट पदार्थ, खून व हड्डी वगैरा इधर-उधर न फेंके, उन्हें गड्ढ़े में दफ़न करें। मुसलमानों को चाहिए कि ईद-उल-अज़हा के दिन गुस्ल करें। साफ सुथरे या नये कपड़े पहनें। खुशबू लगाएं। ईद-उल-अज़हा की नमाज़ से पहले कुछ न खाएं तो बेहतर है। ईदगाह या मस्जिद जाते वक्त तकबीरे तशरीक बुलंद आवाज़ से कहते हुए एक रास्ते से जाएं और दूसरे रास्ते से वापस आएं।

 

ईद-उल-अज़हा की नमाज़ का तरीका बताते हुए कहा कि पहले नियत कर लें कि “नियत की मैंने दो रकात नमाज़ ईद-उल-अज़हा वाजिब म जायद छह तकबीरों के वास्ते अल्लाह तआला के इस इमाम के पीछे मुंह मेरा काबा शरीफ की तरफ। फिर कानों तक हाथ ले जाएं और तकबीरे तहरीमा यानी ‘अल्लाहु अकबर’ कहकर हाथ नाफ के नीचे बांध लें और ‘सना’ पढ़ें।  दूसरी और तीसरी मर्तबा ‘अल्लाहु अकबर’ कहते हुए हाथ कानों तक ले जाएं फिर छोड़ दें। चौथी मर्तबा तकबीर कहकर हाथ कानों तक ले जाएं फिर नाफ के नीचे बांध लें। इमाम जब किरात करे तो मुक्तदी खामोशी से सुनें। अब इमाम के साथ पहली रकात पूरी करें। दूसरी रकात में किरात के बाद तीन मर्तबा तकबीर कहते हुए हाथ को कानों तक ले जाएं और हाथ छोड़ दें, चौथी मर्तबा बगैर हाथ उठाए तकबीर कहते हुए रुकू में जाएं और नमाज़ पूरी कर लें, बाद नमाज़ इमाम खुतबा पढ़े और तमाम हाजिरीन खामोशी के साथ खुतबा सुनें। खुतबा सुनना वाजिब है। जिन मुक्तदियों तक आवाज़ न पहुंचती हो उन्हें भी चुप रहना वाजिब है। इसके बाद दुआ मांगें। सोशल मीडिया पर न ही क़ुर्बानी की फोटो डालें और न ही वीडियो। इस खुशी के मौके पर गरीब मुसलमानों को जरूर याद रखें ताकि गोश्त हासिल करके वह भी वह भी इस खुशी के पर्व में शामिल हो सकें। मदरसों को क़ुर्बानी के जानवर की खाल के साथ बेहतर रकम दें। खाल ले जाने वाले के साथ अच्छा व्यवहार करें।

 

तंजीम दावत-उस-सुन्नाह के सदर कारी मोहम्मद अनस रज़वी ने बताया कि जिन लोगों के परिवार का कोई सदस्य विदेश में रह रहा हो और परिवार वाले भारत में उस सदस्य की तरफ से क़ुर्बानी करवाना चाहते हैं तो भारत में और जिस देश में परिवार का सदस्य रह रहा हो यानी दोनों देशों में क़ुर्बानी का दिन होना जरुरी है। तभी क़ुर्बानी होगी।

 

अंत में सलातो सलाम पढ़कर मुल्क में अमनो अमान व भाईचारे की दुआ मांगी गई। दर्स में हाफ़िज़ अब्दुर्रहमान, हाफ़िज़ आरिफ, मो. कासिद, बशीर खान, मो. इरफ़ान, मो. फरीद, हाजी मो. यूनुस, मो. अफ़ज़ल, इकराम अली, मो. अरमान, जलालुद्दीन, अली हसन आदि ने शिरकत की।

ईद-उल-अज़हा आज : नमाज़ अदा कर दी जाएगी क़ुर्बानी

गोरखपुर। ईद-उल-अज़हा का त्योहार बुधवार को परंपरा के अनुसार मनाया जाएगा। बुधवार, गुरुवार व शुक्रवार लगातार तीन दिन तक क़ुर्बानी दी जाएगी। मुस्लिम भाईयों ने नमाज़ व क़ुर्बानी की तैयारी पूरी कर ली है। ईदगाहों व मस्जिदों में साफ सफाई मुकम्मल हो गई है। बारिश से निपटने के लिए भी इंतजाम किए गए हैं। ईद-उल-अज़हा की नमाज़ सुबह 6 से 10 बजे तक सभी ईदगाहों व मस्जिदों में परम्परागत तरीके से अदा की जाएगी। कोविड 19 की वजह से मुस्लिम समाज त्योहार सादगी के साथ मनायेगा।

-क़ुर्बानी के बाज़ार में रही रौनक़

मंगलवार देर रात कर बकरा व भैंस की खरीदारी होती रही। मोलभाव का भी सिलसिला चला। महंगाई का असर क़ुर्बानी के जानवरों पर साफ दिखा। आठ हजार से लेकर 45 हजार रुपये तक के बकरे बाज़ार में उपलब्ध रहे। इलाहीबाग, उर्दू बाज़ार, शाह मारूफ, खूनीपुर, रेती रोड, तुर्कमानपुर, चक्शा हुसैन, जाहिदाबाद, अस्करगंज, जाफ़रा बाज़ार, उंचवा, गोरखनाथ, रसूलपुर आदि जगहों पर क़ुर्बानी के जानवर का बाज़ार गुलज़ार रहा। वहीं नखास, उर्दू बाज़ार, जाफ़रा बाज़ार, गोरखनाथ में सेवईयां भी खूब बिकी। खोवा व सूखे मेवे भी खरीदे गए। मसाला, प्याज, लहसुन, अदरख की भी खरीदारी हुई। त्योहार के मद्देनज़र कुर्ता पायजामा व अन्य कपड़े भी लोगों ने खरीदे। मुस्लिम मोहल्लों में मेले जैसा माहौल रहा। होटलों पर बाकरखानी व शीरमाल रात से ही बननी शुरू हो गई। जानवरों के खाने के लिए पत्ते, चने आदि भी खूब बिके।

-चिन्हित स्थानों पर होगी सामूहिक क़ुर्बानी

बुधवार को तीन दर्जन से अधिक चिन्हित स्थानों पर सामूहिक क़ुर्बानी होगी। अपशिष्ट पदार्थ को दफ़न करने के लिए गड्ढ़ा वगैरा खोदा जा रहा है। क़ुर्बानी स्थल पर पर्दे वगैरा का भी इंतजाम रहेगा। लोग भैंस-पड़वे में हिस्सा लेने के लिए पेशगी रक़म देते भी नज़र आए। क़ुर्बानी के औजारों पर में धार भी लगवाई गई।

-दो पैग़ंबरों की अज़ीम कुर्बानी का त्योहार ईद-उल-अज़हा

कारी मोहम्मद अनस रज़वी ने बताया कि दीन-ए-इस्लाम में क़ुर्बानियां का स्वर्णिम इतिहास रहा है, उसी में से एक ईद-उल-अज़हा है। जो एक अज़ीम पैग़ंबर हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम व पैग़ंबर हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम की क़ुर्बानी के लिए याद किया जाता है। अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम को काफी दुआओं के बाद बुढ़ापे में हज़रत इस्माइल जैसे प्यारे बेटे से नवाज़ा। कुछ सालों बाद अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम को ख्वाब में अपनी सबसे अज़ीज़ चीज़ क़ुर्बान करने का हुक्म दिया। हज़रत इब्राहिम ने अपने तमाम जानवरों को अल्लाह की राह में क़ुर्बान कर दिया। यह ख्वाब दो मर्तबा हुआ। तीसरी मर्तबा हज़रत इब्राहिम समझ गये कि अल्लाह उनसे प्यारे बेटे की क़ुर्बानी मांग रहा है। यह अल्लाह की अजमाइश का सबसे बड़ा इम्तिहान था। हज़रत इब्राहिम अल्लाह के हुक्म से हज़रत इस्माइल को क़ुर्बानी के लिये मीना ले गये। हज़रत इब्राहिम जब बेटे के साथ क़ुर्बानीगाह पहुंचे तो बेटे ने कहा अब्बा मुझे रस्सियों से बांध दीजिए ताकि मैं तड़प न सकूं। अपने कपड़ों को बचाइए ताकि मां खून देखकर बेचैन न हो जाये। छुरी तेज कर लीजिए ताकि गर्दन आसानी से कट जाये और जान आसानी से निकल जाये। जब हज़रत इब्राहिम अपने जिगर के टुकड़े की गर्दन पर छुरी चलाने लगे तो बार-बार चलाने के बावजूद गला नहीं कटा। इसी बीच गैबी आवाज आई। बस ऐ इब्राहिम तुमने आज अपना ख्वाब पूरा किया। तुम्हें तुम्हारे रब ने पसंद किया, तुम इम्तिहान में कामयाब हुए। इसके बाद से क़ुर्बानी की रवायत शुरू हुई। अल्लाह को सिर्फ उनके हिम्मत और फरमाबरदारी का इम्तिहान लेना था इसलिए जब आंख खोली तो देखा एक दुम्बा़ ज़बह किया हुआ पड़ा है और बेटा खड़ा मुस्कुरा रहा है। उसी अज़ीम पैगंबर की नस्ल से आखिरी रसूल व पैग़ंबरों के सरदार हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम पैदा हुए और इस यादगार के लिए अल्लाह ने उनकी उम्मत को यह तोहफा अता किया।

मौलाना मो. असलम रज़वी ने बताया कि अल्लाह का इरशाद है कि “ऐ महबूब अपने रब के लिए नमाज़ पढ़ों और क़ुर्बानी करो।” खास जानवर को खास दिनों में इबादत की नियत से ज़बह करने को क़ुर्बानी कहते हैं। हदीस में आया है कि पैगंबर-ए-आज़म ने फरमाया कि 10वीं ज़िल हिज्जा में इब्ने आदम का कोई अमल अल्लाह के नज़दीक क़ुर्बानी करने से ज्यादा प्यारा नहीं है। दूसरी हदीस में पैगंबर-ए-आज़म ने फरमाया कि जिसे क़ुर्बानी की ताकत हो और वह क़ुर्बानी न करे वह हमारी ईदगाहों के करीब न आए। एक और हदीस में पैगंबर-ए-आज़म ने फरमाया जिसने खुश दिली व सवाब की नियत से क़ुर्बानी की तो वह आतिशे जहन्नम से बच जायेगा। पैगंबर-ए-आज़म ने फरमाया जो रुपया ईद के दिन क़ुर्बानी मे खर्च किया गया उससे ज्यादा कोई रुपया प्यारा नहीं। क़ुर्बानी तुम्हारे बाप हज़रत इब्राहिम की सुन्नत है। सहाबा ने अर्ज किया इसमें क्या सवाब है। आपने फरमाया हर बाल के बदले नेकी है। पैगंबर-ए-आज़म ने फरमाया आज हम सबसे पहले जो काम करेंगे वह यह है कि पहले नमाज़ पढ़ेगें फिर उसके बाद क़ुर्बानी करेंगे। जिसने ऐसा किया उसने हमारे तरीके को पा लिया और जिसने पहले ज़बह कर लिया वह गोश्त है जो उसने पहले से अपने घर वालों के लिए तैयार किया। क़ुर्बानी से उसका कुछ ताल्लुक नहीं है।

-उलेमा-ए-किराम ने दी साफ-सफाई की हिदायत

कारी शराफत हुसैन क़ादरी ने कहा कि अल्लाह ने क़ुरआन-ए-पाक में क़ुर्बानी करने का हुक्म दिया है। मालिके निसाब पर क़ुर्बानी वाजिब है। क़ुर्बानी से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों को गड्ढ़ों में दफ़न किया जाए। हड्डियां सड़कों पर न फेंके। क़ुर्बानी का गोश्त पास-पड़ोस, गरीबों व फकीरों में जरूर बांटें। जिनके यहां क़ुर्बानी न हुई हो उनके घर सबसे पहले गोश्त भेजवाएं। खाल ले जाने वालों के साथ बेहतर सुलूक करें। क़ुर्बानी की खाल सदका कर दें या किसी दीनी मदरसें को दें साथ में मदरसे को अच्छी रक़म से भी नवाजें।

हाफ़िज़ रहमत अली निज़ामी ने सामूहिक क़ुर्बानी स्थलों पर पर्दा लगाकर क़ुर्बानी करने की अपील की साथ ही कहा कि दीन-ए-इस्लाम चौदह सौ साल से साफ-सफाई का दर्स देता चला आ रहा हैं। साफ-सफाई अल्लाह को पसंद हैं इसका हर मुसलमान को खास ख्याल रखना चाहिए। क़ुर्बानी खुश दिली से करें।

मौलाना जहांगीर अहमद अज़ीज़ी ने कहा कि मुसलमानों का हर त्योहार शांति का दर्स देता हैं। लिहाजा इसका ख्याल रखें कि हमारे किसी काम से किसी को भी तक़लीफ न होने पाए। साफ-सफाई का खास तौर पर ख्याल रखें। जिन पर क़ुर्बानी वाजिब है वह क़ुर्बानी जरूर कराएं।

हाफ़िज़ महमूद रज़ा क़ादरी ने कहा कि साफ-सफाई का ख्याल जरूर रखें। कुर्बानी का फोटो-वीडियो न बनाएं और न ही अपने क़ुर्बानी के जानवर की नुमाइश करें। क़ुर्बानी में बढ़चढ़ कर हिस्सा लें। क़ुर्बानी दिखावे के लिए नहीं अल्लाह की रज़ा के लिए होनी चाहिए।

हाफ़िज़ अज़ीम अहमद नूरी ने कहा कि क़ुर्बानी अल्लाह के लिए होती है। दिखावा अल्लाह को पसंद नहीं है। क़ुर्बानी का वीडियो-फोटो बिल्कुल न बनाया जाए और न ही सोशल मीडिया पर डाला जाए।

मौलाना मोहम्मद अहमद निज़ामी ने कहा कि क़ुर्बानी इबादत है। इसे खुश दिली से अदा करें। अपशिष्ट पदार्थ व खून नालियों में न बहाकर किसी गड्ढें में दफ़न करें और एक अच्छा मुसलमान व अच्छा शहरी होने की जिम्मेदारी निभाएं। ईद-उल-अज़हा त्योहार सादगी से मनाया जाए।

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